तेरे नाम पर, तुझे बेचकर…….

वे आजकल चर्चा का विषय हैं, न चाहते हुए भी हर जगह उन्हें देखना पड़ता है. टीवी मेरा है पर चैनल उनका है. अखबार का पैसा मैं देता हूँ मगर सम्पादक को पैसा वे देते हैं. मुझे समस्या उनके दिखने से नहीं बल्कि उनके बोलने से है. वे अहिंसक हैं पर उनकी बातें हिंसक हैं. वो मेरे सामने आये थे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दुहाई देकर और अब मुझे इसलिए चुप कराना चाहते हैं क्योंकि वे समझते हैं वे सही हैं. (और हाँ, इस समय वे लोग भी गायब हैं जो एक समय कहा करते थे “मैं तुमसे सहमत नहीं हूँ लेकिन मैं तुम्हारे बोलने के अधिकार के लिए तुम्हारे कंधे से कंधा मिलाकर जरुर लडूंगा.”) एक बानगी देखिये….

सवाल:- यह सवाल एक पश्चिमी देश के इसाई की तरफ से है, क्या इस्लामिक हुकूमत में गैर धर्मों को इबादत और प्रचार की इजाजत होगी?

उनका जवाब:- नहीं. जिस तरह आप अपने बच्चों के स्कूल में किसी बच्चे को दो और दो, तीन या पांच नहीं पढ़ाने दे सकते, वैसे ही हम आपको धर्म की गलत शिक्षा देने की इजाजत नहीं दे सकते. आप तकनीक के जानकार हो सकते हैं लेकिन धर्म के जानकार हम हैं, इसलिए हम किसी और धर्म के प्रचार या मान्यता की इजाजत नहीं देंगे.

जी! बात (तथाकथित) डा. जाकिर नाइक की हो रही है, जो धर्म के नाम पर ये सब कहते हैं. तो मन में सवाल आया आखिर धर्म क्या है? पांच सौ साल पहले सिख नहीं थे, चौदह सौ साल पहले मुस्लिम नहीं थे, दो हजार साल पहले इसाई नहीं थे, पांच हजार साल पहले बौद्धों का कहीं अता पता नहीं था. तो ये जो धर्म को अनादि-अनंत बताते हैं ये झूठ बोलते हैं? या इनमें से कोई धर्म है ही नहीं? ये धर्म नहीं हैं तो क्या हो सकते हैं? हाँ, ये सब सम्प्रदाय हो सकते हैं. सम्प्रदाय कहना ठीक होगा.

बचपन से घर में सुनता आया था कि धर्म एक है रीति रिवाज अलग अलग हो सकते हैं और हर व्यक्ति की मान्यता और रीति रिवाज को सम्मान देना चाहिए (भले ही आप उस से सहमत न हों.) क्योंकि यह सामाजिक/भौगोलिक/आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार तय होते हैं. यह समझ में आता भी था तो फिर ये सज्जन कौन हैं जो मुझे असहिष्णु कहते हुए केवल अपनी धार्मिक मान्यताओं को सही कह रहे हैं? क्या यही इनका धर्म कहता है? खैर! सवाल उठा तो खास तौर पर मुस्लिम संतों के बारे में पढने की ठानी. जो सामने आया वह आपके सामने है. (मुस्लिम धर्म का अधिकतर साहित्य दूसरी भाषाओँ में है इसलिए अनुवाद भी साथ ही दे रहा हूँ.)

तरीकत बुजुज खिदमते-खल्क नीस्त, ब-तस्बीह-ओ-सज्जादा-ओ-दल्क नीस्त. (शेख सादी)

अर्थ:- ऐ मालिक तेरी खिदमत तेरे बन्दों की खिदमत करने में है, तस्बीह फेरने, सजदों में झुकने या लबादे पहन लेने में नहीं.

कअबा बुंगाहे-खलीले-आजर अस्त, दिल गुजरगाहे-जलीले-अकबर अस्त.

दिल बदस्त आवर किह हज्जे-अकबर अस्त, अज हजारां कअबा यक दिल बिहतर अस्त. (मौलाना रूम)

अर्थ:- तू जिन्दा दिलों की परिक्रमा कर क्योंकि यह हजार काबों से बेहतर स्थान है, काबा हजरत इब्राहिम के पिता का बुतखाना था पर यह दिल तो प्रभु के प्रकट होने का स्थान है. (बुतखाना मतलब जहाँ मूर्तियाँ रखी हों, काबे को बुतखाना कहने की हिम्मत किसी फ़कीर में ही हो सकती है.)

मै खुर ओ मुसहफ़ बसोज ओ आतिश अन्दर कअबा जन,

हर चिह ख्वाही कुन व-लेकिन मर्दुम आजारी मकुन.

अर्थ:- शराब पी ले, कुरआन जला दे काबा में आग लगा दे मगर किसी इंसान के दिल को न दुखा.

मैंने ख़ास तौर पर संतों/फकीरों के कहे को ही पढने की कोशिश की क्योंकि संत समय की आवाज होते हैं. वे स्वधर्म में मौजूद खामियों पर भी बात रखते हैं और नयी परम्पराओं की जरूरत होने पर उनकी शुरुआत भी करते हैं. किसी धार्मिक किताब को पढने से मैं इसलिए भी बचा कि किताबें समय के साथ पुरानी हो जाती हैं और उनके शब्द धर्म की लाश से उठती बदबू में बदल जाते है. अन्यथा कोई कारण नहीं कि हिन्दुओं में चार वेद, अठारह पुराण, छः आस्तिक दर्शन और दो नास्तिक दर्शन आये तो दूसरी तरफ ईसाईयों में ओल्ड टेस्टामेंट पुराना पड़ने लगा तो समय की जरूरत से न्यू टेस्टामेंट आया. सिख धर्म को अभी इतना पुराना नहीं कहा जा सकता कि नए ग्रन्थ की जरूरत पड़े, वैसे भी गुरु ग्रन्थ साहिब में समय के बेहतरीन संतों की शिक्षाएं मौजूद हैं भले ही वे हिन्दू मुस्लिम सिख जो मर्जी रहे हों. केवल मुस्लिम धर्म अभी इस प्रक्रिया से नहीं गुजरा है और शायद यही इस समस्या का कारण है.

पुराने विचार सर पर लादकर वक्त के साथ दौड़ा नहीं जा सकता. और जब आप दौड़ नहीं पाते तो दौड़ने वालों से आपको नफरत होती है जो किसी भी लंगड़े व्यक्ति के लिए स्वाभाविक है. ऐसे में लंगड़ा व्यक्ति खुद तो नहीं दौड़ पायेगा लेकिन दौड़ने वाले को अडंगी लगाने की कोशिश जरुर करेगा. अन्यथा अधिकांश आतंकवादियों के मुस्लिम होने और उनके प्रगतिशील कौमों से लड़ने के पीछे और कोई कारण मुझे समझ नहीं आता.

खैर! वापस डा. जाकिर नाइक पर आते हैं. आखिर ऐसा क्यों होता है कि डा. जाकिर नाइक जैसे लोग शांति का लबादा ओढ़े अशांति फैलाने की कोशिश करते हैं? और उन्हें समाज से तो भरपूर समर्थन मिलता दिखता है लेकिन उसी समाज के अधिकांश व्यक्तियों से आप बात करें तो तस्वीर कुछ और होती है. मैंने पिछले एक हफ्ते में कई मुस्लिम दोस्तों से जाकिर नाइक बारे में बात की तो इनके लिए इस्तेमाल शब्दों में “रट्टू तोता, इस्लामिक सेल्समैन, नकली स्कॉलर” इत्यादि शब्द निकल कर सामने आये. तो फिर ऐसा क्यों कि अब तक कोई भी विरोध की आवाज न तो सामाजिक स्तर पर मुस्लिमों की तरफ से जाकिर नाइक के खिलाफ सुनाई दी न ही बात बात पर फतवे देने वाले धर्म के अलम्बरदार और चुनाव के समय अलग अलग नेताओं के लिए वोट देने की अपील करने वाले इमाम साहब नींद से जागे?

इसके उलट गुजरात दंगा हुआ तो विरोध का बड़ा और पहला स्वर हिन्दुओं की तरफ से उठा. १९८४ में सिखों के मामलों में अधिकतर गवाह हिन्दू बने क्योंकि राजनैतिक रोटियों की आग में धर्म की सहिष्णुता नहीं जलने दी जा सकती. २०१४ में चुनाव जीतने के लिए मुद्दे के तौर भाजपा ने धर्म के बजाय विकास को चुना क्योंकि वे जानते हैं कि उनका बहुलांश वोट बैंक धार्मिक कट्टरवाद के लिए वोट नहीं देगा. उत्तर प्रदेश के रामशंकर कठेरिया का मंत्री पद केवल उनकी कट्टर बयानबाजी के कारण गया है. हिन्दू समुदाय इस मामले में समय-समय पर अपने धार्मिक नेताओं और राजनैतिक आकाओं से अलग आवाज उठाता रहा है, जो मुस्लिम समुदाय में नहीं दिखता. तो राजनेता क्या गलत करते हैं जब वे स्टेज पर टोपियाँ पहन कर चढ़ने को ही मुस्लिम धर्म के हक़ की सियासत बताते हैं? आप सही गलत के आधार पर आवाज नहीं उठा सकते तो कोई क्यों आपको आपका अधिकार देगा? आप अपने वोट/विचार मुफ़्ती/मौलाना/इमामों के क़दमों में गिरवी रख देंगे तो आपको कोई हक़ नहीं कि आप अपने पिछड़ेपन और गरीबी के लिए नेताओं को दोष दें.

मैं भारतीय मुसलमानों को दूसरे मुसलमानों से अलग इसलिए भी मानता हूँ क्योंकि हर धर्म पर स्थानीय संस्कृति का असर दिखता है. सांस्कृतिक विभिन्नता धर्म को उन्नत बनाती है लेकिन यह कुछ जिम्मेदारियां भी लेकर आती है. ऐसी ही जिम्मेदारी आज भारतीय मुसलमानों के कन्धों पर हैं. डा. जाकिर नाइक जैसे लोगों का विरोध आपको सामने आकर करना पड़ेगा, अन्यथा उसी कट्टरता का इल्जाम आप पर आयेगा तो दोषी भी आप ही होंगे. एक आतंकी के मारे जाने पर २०००० लोग उसके जनाजे में शामिल हों और जेएनयू के उमर खालिद उन्हें शहीद घोषित करें, उमर अब्दुल्ला उस आतंकी जैसे लाखों के पैदा होने की कामना करें और आप खमोश रहें तो देश के लिए अवाज न उठाने का इल्जाम भी आप ही के सर आयगा. आप कश्मीर में खामोश थे, आप मालदा में खामोश थे, आप हाजीपुर में खामोश थे, आप गोधरा में खामोश थे, आप डा. नारंग के लिए नहीं बोले. मौक़ा एक बार फिर आया है. खामोश रहिये या आवाज उठाइये और बताइए कि आप भेड़ों का रेवड़ भर नहीं हैं. चुनाव आपका है….

समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याघ्र,

जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।

About Satish Sharma 44 Articles
Practising CA. Independent columnist in News Papers. Worked as an editor in Awaz Aapki, an independent media. Taken part in Anna Andolan. Currently living in Roorkee, Uttarakhand.

2 Comments

  1. sir, great thought. every muslim who are indian they must thought first about their nation not their religion.

  2. Every indian must raise their voice against all ill things which are going in our society.wheather its is muslim or hindu and all. Country first then religion come.

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