दास्तान, जो खो गई……

इतिहास में होता है ज़िक्र राजाओं, महाराजाओं, राणाओं, महाराणाओं का। उनकी वीरता के क़िस्से सदियों तक सुनाए जाते हैं समाज में। चारण, भाट करते हैं उनकी वंदना, कवि लिखते हैं कविताएँ वीर रस से लेकर रौद्र रस में डूबी हुई, उनकी किवदंतियाँ काम आती हैं कौमों को जगाने के। लेकिन इतिहास इतना निष्पक्ष नहीं रह पाता जितना उसे रहना चाहिए, इसलिए इतिहास के पन्नों में नहीं मिलते हैं राजाओं, महाराजाओं, राणाओं, महाराणाओं को पालने वाले हाथ, उन्हें अस्त्र-शस्त्र सिखाने वाले चेहरे, उनके घोड़ों का ख़याल रखने वाले अस्तबल के कर्मचारी, उनके तीरों-भालों को चमकाने वाले लोग। सत्ता के साथ खड़े होने की मजबूरी बंद कर देती है इतिहास की आँखें लेकिन लोक गाथाओं के साथ ऐसी कोई मजबूरी नहीं है। लोक गाथाओं में राजा, महाराजाओं से बड़ा हो सकता है उनके किसी साधारण कर्मचारी का क़द, क्योंकि यह व्यक्ति साधारण कर्मचारी के साथ साथ असाधारण चरित्र भी था। संगठित इतिहास से हमेशा टक्कर लेती हैं लोक गाथाएँ। ऐसी ही लोकगाथा मेवाड़ की गलियों में मिलती है, नुक्कड़-बस्ती में भटकने पहुँचोगे तो टकराएगी ज़रूर आपसे।

उदयपुर

मेवाड़ राज्य की राजधानी उदयपुर को बसाने का श्रेय महाराणा उदय सिंह को जाता है, लेकिन इस ख़ूबसूरत शहर में महाराणा उदय सिंह से भी बड़ा क़द था किसी का। उदयपर से पहले मेवाड़ राज्य की राजधानी लगभग एक हज़ार साल तक चित्तोड़गढ रही थी क्योंकि यह राजनयिक रूप से सुगम जगह थी। उदयपुर का इतिहास खोजने जाएँगे तो तथ्यों की खुदाई चित्तौड़गढ़ से शुरू करनी होगी। चार सौ साल पीछे जाना होगा।

सोलहवीं शताब्दी में। स्थान चित्तौड़गढ़, मेवाड़ राज्य की राजधानी, राजपूताना का गौरव। महफ़ूज़ राज्य, राणा सांगा और रानी करणावती की छत्रछाया में। राणा सांगा जितने वीर योद्धा और चतुर राजनयिक थे रानी करणावती प्रजा के काम में उतनी ही सह्रदय। लेकिन प्रजा के कामों में ध्यान देने की क़ीमत रानी की अपनी संतानों को चुकानी पड़ती है, इसलिए राजपूत घरानों में भविष्य के राजाओं को पालने की ज़िम्मेदारी रानी से ज़्यादा विश्वासपात्र नौकरानियों की होती है, जिन्हें सम्मान से ‘धाय-माँ’ कहा जाता है। राणा सांगा के बच्चों का ध्यान रखने की ज़िम्मेदारी पन्ना-बाई के ज़िम्मे थी।

पन्नाबाई राणा सांगा के बच्चों की धाय-माँ थीं। पन्नाबाई पश्चिमी भारत की गुर्जर क़ौम से थीं। उनके ऊपर ज़िम्मेदारी थी राणा सांगा के बेटे उदय सिंह को पालने की। पन्ना बाई का अपना भी एक बेटा है, चंदन। चंदन और उदय की उम्र लगभग बराबर है। राणा और रानी राज्य के कार्यों में व्यस्त रहते हैं इसलिए उदय और चंदन केवल धाय माँ की ज़िम्मेदारी हैं। राणा के राज्य में कोई कष्ट नहीं और समय अच्छे से गुज़र रहा है लेकिन अच्छा समय हमेशा तो नहीं रहता।

सन 1527 में बाबर के साथ खानवा युद्ध में राणा की मृत्यु होती है और राणा सांगा के 7 पुत्रों में से 4 पहले ही मारे जा चुके हैं और अब राणा बनने की ज़िम्मेदारी रतन सिंह के ऊपर आती है लेकिन उनकी मृत्यु भी चार साल के भीतर हो जाती है। रतन सिंह के बाद राणा की उपाधि उनके अगले बेटे यानी विक्रमादित्य को दी जाती है। उदय सिंह अभी भी बहुत छोटे हैं और धाय माँ का बेटा चंदन उनके साथ ही पल रहा है, उनकी अपनी देख रेख में। एक धाय माँ की ज़िम्मेदारी है तो दूसरा उनका ख़ून।

राणा विक्रमादित्य केवल १४ साल की उम्र में गद्दी सम्भालने के बाद राजकाज से ज़्यादा समय भोग विलास में बिताते हैं, पड़ोसी राज्यों से उनके सम्बंध ख़राब हैं, राज्य का पुराना वैभव अभी बरक़रार है और राणा सांगा के विश्वासपात्र उसे बनाए रखने की पूरी कोशिश करते हैं, नए राणा की तमाम बदतमीजियों के बावजूद। रानी करणावती किसी तरह प्रजा का ध्यान रखने की कोशिश कर रही हैं। विक्रमादित्य की यह ख्याति तमाम राजपूताने को पार करके गुजरात के राजा बहादुर शाह तक पहुँच जाती है और वे 1532 में मेवाड़ पर आक्रमण कर देते हैं।

धाय-माँ पन्ना बाई गुजरात से हैं, जन्मभूमि या कर्मभूमि के बीच वो किसे चुनेंगी? पन्ना ने कर्मभूमि को चुना और रानी करणावती के साथ तमाम राजपूताने से सहायता माँगने की कोशिश की लेकिन राणा विक्रमादित्य के साथ खड़ा होने के लिए कोई भी राजपूत राजा तैयार नहीं था। राणा विक्रमादित्य लड़ाई हार गए, तमाम राजनयिक प्रयासों के बाद मेवाड़ राज्य का ख़ज़ाना बहादुर शाह को देने की शर्त पर बहादुर शाह की फ़ौजें वापस लौट गई।

 

लेकिन ये फ़ौजें वापस गई थी कुछ समय बाद फिर से वापस आने के लिए। रानी करणावती फिर से तमाम राजपूताने से मदद की गुहार लगातीं हैं लेकिन कोई भी राजा अपनी सेना को विक्रमादित्य के लिए दाँव पर नहीं लगाना चाहता। सभी राजा मेवाड़ राज्य का साथ देने से इंकार कर देते हैं। सभी। ऐसे में धाय माँ के सुझाव पर रानी करणावती मुग़ल बादशाह हुमायूँ को राखी भेजकर मदद की गुहार लगाती हैं। यह मदद एक मुग़ल बादशाह से दूसरे मुग़ल बादशाह के ख़िलाफ़ माँगी गई थी और वो भी ऐसे राज्य से जिनके साथ पिछले लगभग एक दशक से कोई राजनयिक सम्बंध तक नहीं था। रानी करणावती को इस ख़त का जवाब भी आने की उम्मीद नहीं थी। लेकिन जवाब आया। हुमायूँ बंगाल में था। 1600 किमी दूर, 320 घंटे का सफ़र, वो भी बिना रुके। लेकिन हुमायूँ बिना कुछ सोचे बंगाल छोड़कर चित्तौड़ की ओर चल पड़ता है। हुमायूँ चला तो समय से था लेकिन पहुँचा देरी से। उसके पहुँचने से पहले मेवाड़ राज्य लड़ाई हार गया और रानी करणावती को 13000 महिलाओं के साथ जौहर करना पड़ा।

वह जगह जहाँ 8 मार्च 1535 को रानी करणावती ने जौहर किया।

लेकिन जौहर से पहले रानी करणावती धाय-माँ को चंदन और उदय के साथ महल से भगा देती है। हुमायूँ ने बहादुर शाह की सेना को हराकर मेवाड़ को मुक्त कराया और विक्रमादित्य को उसका राज्य सौंप कर वापस चला गया।

धाय माँ भी चंदन और उदय के साथ दोबारा महल में वापस आ गई। उदय जिसके पिता नहीं थे और अब माँ भी नहीं है। उदय जिसे बड़ा होकर मेवाड़ राज्य सम्भालना है। उदय जिसके लिए सब कुछ अब धाय माँ हैं। राणा विक्रमादित्य लगातार वहीं सब कुछ कर रहा जिसके कारण मेवाड़ राज्य को इतने संकट झेलने पड़े। दरबारीगण विक्रमादित्य को गद्दी से उतारकर नज़रबंद कर देते हैं। और सर्वसम्मति से राणा उदय सिंह, जो अभी बच्चा ही है, के नाम पर राजकाज चलाने लगते हैं। तमाम दरबारियों में एक दरबारी है बनवीर सिंह, राणा सांगा के बड़े भाई का नाजायज़ बेटा, जो यह मानता है कि गद्दी पर हक़ उसका था और राणा सांगा ने उसका हक़ छीना है। उसके लिए यह मौक़ा है, विक्रमादित्य को मारकर गद्दी पर क़ब्ज़ा करने का। और वह एक रात ऐसा कर भी देता है। उदय की सुरक्षा को लेकर सशंकित धाय-माँ अब केवल धाय माँ नहीं रही थी, उसका अपना गुप्तचर संगठन था जो उदय की सुरक्षा से सम्बंधित सभी ज़िम्मेदारियों को सम्भालता था। धाय माँ तक विक्रमादित्य की मृत्यु की ख़बर पहुँच चुकी है।

धाय माँ जानती है कि अगला वार उदय पर होगा और इसमें कुछ ही क्षण बचे हैं या अधिक से अधिक कुछ घंटे। विक्रमादित्य को मारकर बनवीर सिंह उदय के महल की ओर बढ़ रहा है। धाय माँ उदय सिंह को गंदी पत्तलों के एक टोकरे में छुपाकर एक नौकर से इस टोकरे के साथ नदी किनारे इंतज़ार करने को कहती है। गंदे पत्तलों का टोकरा ले जाते नौकर पर किसी को शक नहीं होगा। धाय माँ मौक़ा लगते ही वहाँ पहुँच कर उदय सिंह को सुरक्षित जगह ले जायगी।

तो क्या उदय सिंह सुरक्षित है? नहीं क्योंकि जब तक बनवीर उसे मार नहीं देता तब तक वह उसका पीछा नहीं छोड़ेगा।

तो धाय माँ क्या करे? धाय माँ उदय के बिस्तर पर अपने बेटे को सुला देती है।

बनवीर कमरे के दरवाज़े पर आता है। धाय माँ दरवाज़ा खोलती है, बनवीर के हाथ में विक्रमादित्य के ख़ून से सनी नंगी तलवार है। उसकी नज़रें उदय के बिस्तर पर जाती है। बनवीर उदय के बिस्तर की ओर बढ़ता है, धाय माँ उसे रोकने की कोशिश करती है। बनवीर धाय माँ को धक्का देकर उदय को उसके बिस्तर में ही तलवारों के वार से मार देता है।

चंदन मर गया है इसलिए उदय अब सुरक्षित है। लेकिन धाय माँ की परीक्षा अभी ख़त्म नहीं हुई। उसे अपने बेटे के मृत शरीर को छोड़कर उदय के पास जाना है। उसे सुरक्षित जगह पहुँचाना है।

अगली सुबह सबको पता लगता है उदय की ज़िम्मेदारी उठाने वाली धाय माँ मुसीबत आते ही अपने बेटे की जान बचाने के लिए उदय सिंह को मुसीबत में अकेला छोड़कर अपने बेटे के साथ भाग गई।

‘कायर औरत!’ प्रजा कहती है।

कई हफ़्तों तक पैदल चलने के बाद धाय माँ अरावली की पहाड़ियों में भीलों के बीच जाकर मदद पाती है। अभी भी उदय सुरक्षित नहीं है क्योंकि भील किसी भी तरह उसकी रक्षा करने में सक्षम नहीं हैं। अब धाय माँ गुप्त रूप से राजनयिक वार्ताओं के द्वारा कुंभलगढ़ क़िले के किलेदार आशा देपुरा सिंह से मदद लेने में कामयाब हो जाती है और उदय को कुम्भलगढ़ के क़िले में पाला जाता है। उसे एक राजकुमार की तरह अस्त्र-शस्त्र और शास्त्र सिखाएँ जाते हैं। यही उदय सिंह आगे जाकर सत्रह साल की उम्र में अपना राज वापस लेते हैं, उदयपुर की स्थापना करते हैं और इनके बेटे महाराणा प्रताप को तो सब जानते है हैं। उदय सिंह ने वह ज़िंदगी जीने की कोशिश की जो ऐसे किसी भी बलिदान से निकले व्यक्ति को जीनी चाहिए।

एक माँ के सामने उसके अपने बेटे की हत्या, उसके बाद उसके मृत शरीर को वहीं छोड़कर आना, भगौड़ा होने का कलंक लम्बे समय तक झेलना, यहाँ तक कि अपने बेटे की मौत पर रो भी ना सकना क्योंकि यह उदय के लिए ख़तरा साबित हो सकता है, बस इतना ही बलिदान था धाय माँ का!

इतिहास भले ही पन्नाबाई ‘धाय माँ’ के लिए शब्दों के अकाल से जूझ रहा हो, लेकिन लोकगाथाएँ अभी बाँझ नहीं हुई हैं। उदयपूर में राणा उदय सिंह से बड़ी मगर अदृश्य प्रतिमा धाय माँ की देखी जा सकती है। इसी प्रतिमा की छांव में बसा है यह शहर………

About Satish Sharma 44 Articles
Practising CA. Independent columnist in News Papers. Worked as an editor in Awaz Aapki, an independent media. Taken part in Anna Andolan. Currently living in Roorkee, Uttarakhand.

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